
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बसा दंतेश्वरी मंदिर आस्था का अनोखा केंद्र है। यहां का एक स्तंभ भक्तों की मनोकामना पूरी होने का संकेत देता है। दोनों हाथों से यदि खंभे को पूरी तरह समेट लिया जाए, तो मां की कृपा निश्चित है। ऐसा न हो सके, तो इच्छा अधर में लटक जाती है।
मां दंतेश्वरी की छह भुजाओं वाली प्रतिमा शस्त्रों, शंख और असुर के अवशेषों से सुसज्जित है। यह शक्तिपीठ मां सती के दांत के गिरने की जगह माना जाता है, जिससे नाम पड़ा दंतेश्वरी। बस्तर की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने वाली मां यहां भक्तों की हर मुराद पूरी करती हैं।
400 वर्ष से अधिक पुराना यह दक्षिण भारतीय शैली का मंदिर काकतीय राजवंश से जुड़ा है। राजा अन्नमदेव को मां की कृपा से विशाल राज्य प्राप्त हुआ था। नदी तट पर मां के चिह्न भी विद्यमान हैं, जिनके दर्शन भक्त अवश्य करते हैं।
मंदिर में सिले वस्त्र निषिद्ध हैं। धोती या लुंगी बांधकर ही गर्भगृह में प्रवेश होता है। प्रशासन द्वारा धोती उपलब्ध कराई जाती है। प्राचीन पूजा पद्धतियां आज भी जीवंत हैं।
नवरात्रि पर लाखों भक्त उमड़ते हैं। कईयों की कहानियां प्रेरणा देती हैं—रोगमुक्ति से लेकर धनलाभ तक। यह खंभा आस्था का प्रतीक है, जो भक्तों को मां के चमत्कार से जोड़ता है। दंतेश्वरी मंदिर सिद्ध करता है कि सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती।