
महिला दिवस के अवसर पर नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय महिला विचारक सम्मेलन के दूसरे दिन ‘प्रकृति और संस्कृति’ विषय पर गहन चर्चा हुई। सात वक्ताओं ने सिनेमा और मीडिया के महिलाओं पर सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों को बेनकाब किया।
दंगल जैसी फिल्मों को सशक्तिकरण का प्रतीक बताते हुए किरण चोपड़ा ने एनिमल, कबीर सिंह और मिर्जापुर जैसी फिल्मों की आलोचना की, जहां महिलाओं को वस्तु बनाकर नशे को बढ़ावा दिया गया। उन्होंने कहा, ‘दंगल ने बेटियों को पहलवान बनाने की प्रेरणा दी। लेकिन सिर पर शराब का गिलास रखकर नाचने वाले दृश्यों ने सोशल मीडिया से घर-घर तक खतरनाक ट्रेंड फैला दिया।’
चोपड़ा ने जोर देकर कहा, ‘मीडिया महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाता है, जो हमारी भावुकता का शोषण करता है। महिलाएं स्वयं शक्तिशाली हैं, बस आंतरिक क्षमता को जागृत करने की जरूरत है।’
संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष संध्या पुरेचा ने वेद-पुराणों का सहारा लिया। ‘स्त्री को शक्ति स्वरूप माना गया है। घरेलू हिंसा जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए प्राचीन ज्ञान से सीख लें।’
सम्मेलन ने सिनेमा को जिम्मेदार बनाने की मांग की, ताकि महिलाओं का सकारात्मक चित्रण हो।