
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने केंद्र सरकार से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण को गति देने की जोरदार अपील की है। संगठन का मानना है कि इस कदम से न केवल सरकारी खजाने में भारी पूंजी आएगी, बल्कि ये कंपनियां अधिक कुशल और लाभदायक बन सकेंगी।
हाल के वर्षों में विनिवेश लक्ष्य अधूरे रहने से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। वित्त वर्ष 2023-24 में 51,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वास्तविक प्राप्ति इससे काफी कम रही। सीआईआई के अनुसार, निजीकरण से प्रबंधन में सुधार, तकनीकी उन्नयन और निवेश आकर्षित होगा।
‘सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार नहीं हैं। निजीकरण ही एकमात्र रास्ता है,’ सीआईआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा। संगठन ने स्टील, उर्वरक और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में निजीकरण पर जोर दिया है।
हालांकि, कर्मचारी यूनियनों और विपक्षी दलों का विरोध एक बड़ी बाधा है। नौकरी छिनने और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कई सौदे अटके पड़े हैं। सीआईआई ने सुझाव दिया कि कर्मचारियों के लिए स्टॉक ऑप्शन और पुनर्वास पैकेज उपलब्ध कराए जाएं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में 5 लाख करोड़ से अधिक की राशि जुटाई जा सकती है। यह राशि बुनियादी ढांचे, कल्याण योजनाओं और राजकोषीय घाटे को कम करने में उपयोगी होगी।
चुनावी मौसम में सरकार के सामने सुधार और लोकलुभावनवाद के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा। सीआईआई की यह अपील आर्थिक पुनरुद्धार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। भारत को वैश्विक महाशक्ति बनाने के सपने को साकार करने के लिए निजीकरण अपरिहार्य है।