
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में मैनपुर तहसील का खजुरपददर गांव अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय से होली का त्योहार मनाना बंद है। लगभग दो हजार की आबादी वाला यह गांव होली के दिन भी सामान्य जीवन जीता है। न होलिका दहन होता है, न रंगों की धूम। ग्रामीण घरों में रहकर काम करते हैं और देवी-देवताओं की आराधना में लीन रहते हैं।
गांव में ग्राम श्रीमाटी देवता और शानपाठ देवी की पूजा प्रमुख है। ग्रामीणों का अटल विश्वास है कि देवियों ने ही होली पर पाबंदी लगाई। करीब सवा सौ साल पहले तक होली मनती थी, लेकिन एक बार रंग-गुलाल से देवियां क्रोधित हो गईं। इसके बाद चेचक जैसी महामारी और उल्टी-दस्त की बीमारियां फैलीं। गांव तबाही के कगार पर पहुंच गया।
पूर्वजों ने माफी मांगी, विशेष पूजाएं कीं, व्रत रखे। देवियां प्रसन्न हुईं तो संकट टला। तब से गांव वालों ने होली न मनाने का संकल्प लिया, जो आज तक कायम है। होली के दिन कोई उत्सव नहीं, बस पूजा-पाठ और प्रार्थनाएं। परिवार की सुख-शांति के लिए मन्नतें मांगी जाती हैं। युवा भी इस रिवाज को निभाते हैं।
परंपरा इतनी सख्त कि बाहरी लोग रंग नहीं लगाते। 15-20 साल पहले किसी ने कोशिश की तो फिर बीमारी फैली। पूजा से ही बात बनी। जनपद सदस्य जयसिंह नागेश, सरपंच कुमारी बाई और अन्य ग्रामीण कहते हैं, देवी का भय ही गांव की रक्षा करता है।
यह गांव छत्तीसगढ़ की आस्थामय विविधता का प्रतीक है। जहां देश रंगों में रंगा होता है, वहां शांति और भक्ति का राज चलता है। ऐसी परंपराएं पीढ़ियों को जोड़ती हैं।
