
लखनऊ की स्पेशल सीबीआई अदालत ने उत्तर प्रदेश में 6.75 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड मामले में चार लोगों को आठ साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही प्रत्येक पर 70 लाख रुपये का जुर्माना और दो कंपनियों पर संयुक्त रूप से 2 करोड़ का罚 लगाया गया। यह फैसला वित्तीय अपराधों के खिलाफ मजबूत न्यायिक कदम है।
दोषी करार दिए गए रामजी मिश्रा, श्यामजी मिश्रा, अखिलेश कुमार मिश्रा और मनीषी पांडे हैं। वाराणसी की मनीषी एंटरप्राइजेज और मिर्जापुर कार्पेट्स नामक कंपनियां भी दोषी पाई गईं।
यह घोटाला 1996 में शुरू हुआ जब मिर्जापुर कार्पेट्स ने जाली दस्तावेजों से सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की मिर्जापुर शाखा से ऋण सुविधा हासिल की। उस समय रामजी मिश्रा प्रबंध निदेशक थे और अन्य मिश्रा भाई निदेशक।
सीबीआई ने 13 मार्च 2001 को शाखा प्रबंधक एसएन वर्मा समेत अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। जांच के बाद 17 मार्च 2004 को सात लोगों और दो फर्मों के विरुद्ध आरोपपत्र दायर हुआ।
अदालत ने ट्रायल के बाद सजा सुनाई, जबकि वर्मा और यदुनाथ दुबे को साजिश के प्रमाण न मिलने पर बरी किया। पंकज कुमार तिवारी का केस मेडिकल आधार पर अलग किया गया। यह सजा बैंकिंग क्षेत्र में विश्वास बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।