
देश की जीडीपी वृद्धि 8.2 प्रतिशत पर पहुंचने से राजनीतिक गलियारों में हंगामा मच गया है। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ विजन की जीत बताया। ‘बुनियादी ढांचे का विस्तार, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा और डिजिटल इंडिया जैसी पहलों का कमाल है ये,’ पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा।
विपक्ष ने इसे ‘डेड इकोनॉमी’ करार देते हुए केंद्र पर हमला बोला। कांग्रेस के पी चिदंबरम ने कहा, ‘बेरोजगारी चरम पर, ग्रामीण संकट गहरा रहा और असमानता बढ़ रही है। ये आंकड़े जनता की पीड़ा को छिपा रहे हैं।’ समाजवादी पार्टी और अन्य दलों ने भी आंकड़ों पर सवाल उठाए।
आंकड़ों का विश्लेषण करें तो सेवा क्षेत्र और निर्माण में तेजी दिखी, लेकिन निजी खपत कमजोर रही। वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद आरबीआई ने 7 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का अनुमान लगाया। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सुधारों की निरंतरता जरूरी है।
मानसून सत्र में ये बहस गरमाएगी। भाजपा राज्य सफलताओं का बखान करेगी, तो विपक्ष रोजगार पर सफेद पत्र मांगेगा। निवेशकों के लिए संकेत साफ है- भारत की विकास गाथा बरकरार है, लेकिन राजनीतिक शोर बाजार को प्रभावित कर सकता है। असली चुनौती है 140 करोड़ भारतीयों तक समावेशी समृद्धि पहुंचाना।