
भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में पंडित बिरजू महाराज एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने कथक को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनकी एक ऐसी प्रस्तुति याद है जब उन्होंने मंच पर घुँघरुओं की थाप से भाप इंजन की ट्रेन चला दी, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गई।
1938 में कालका-बिंदा गिनती घराने में जन्मे बिरजू महाराज ने बचपन से ही कथक की बारीकियाँ सीखीं। नौ साल की उम्र में पिता के निधन के बाद उन्होंने परिवार की कलात्मक जिम्मेदारी संभाली। फिर भी, उनकी प्रतिभा ने उन्हें विश्व पटल पर पहुँचा दिया।
वह ट्रेन वाला अभिनय 1970 के दशक की एक प्रमुख प्रस्तुति का हिस्सा था। पैरों की तेज़ चाल से इंजन की आवाज़, तान से भाप की सीटी और बोलों से रेल की गति—सब कुछ जीवंत हो उठा। ‘घुँघरू में कथक की आत्मा बोलती है,’ यही उनकी कला का मूल मंत्र था।
महाराज ने फिल्मों में भी योगदान दिया, जैसे ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘देवदास’। उन्होंने उस्ताद रविशंकर जैसे दिग्गजों के साथ काम किया और दिल्ली के संगीत भारती में नई पीढ़ी को प्रशिक्षित किया। पद्म विभूषण से सम्मानित यह नर्तक कथक को वैश्विक बनाया।
आज भी उनकी रिकॉर्डिंग्स देखकर लगता है कि ट्रेन अभी भी मंच पर दौड़ रही है, कथक की आत्मा लेकर। बिरजू महाराज अमर हैं।