
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक ऐतिहासिक घोषणा की है, जिसमें राज्य सरकार ने 3.5 लाख से अधिक चाय बागान श्रमिक परिवारों को उनकी रहने वाली जमीन का मालिकाना हक सौंप दिया है। यह कदम समकालीन भारत के सबसे बड़े भूमि सुधारों में शुमार है और चाय जनजाति समुदाय के लिए सामाजिक न्याय की नई सुबह का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री ने एक्स प्लेटफॉर्म पर लिखा कि असम फिक्सेशन ऑफ सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत यह सुधार लागू हुआ है। दशकों से चाय बागानों में मेहनत करने वाले श्रमिकों को अब वह जमीन मिल गई है, जिस पर वे पीढ़ियों से रहते आए हैं। पहले चाय कंपनियों की संपत्ति मानी जाने वाली यह जमीन अब उनके नाम पर दर्ज हो गई है।
लगभग 200 वर्षों तक असम की विश्वप्रसिद्ध चाय उगाने वाले इन श्रमिकों को लेबर लाइनों में असुरक्षित जीवन जीना पड़ा। बागान बंद होने या नौकरी छूटने पर बेदखली का डर हमेशा बना रहता था। पुराने कानूनों ने चाय बागानों को सुधार के दायरे से बाहर रखा था।
नए कानून से सरकार लेबर लाइनों की जमीन अधिग्रहित कर पात्र परिवारों को पट्टा दे रही है। यह 825 से अधिक चाय बागानों को कवर करता है। इससे श्रमिक न केवल मकान के मालिक बने, बल्कि पीएम आवास योजना जैसे लाभ भी ले सकेंगे।
सरमा ने कहा कि यह चाय जनजाति के उत्थान का बड़ा कदम है। विपक्ष के शोर के बीच सरकार ने वास्तविक सुधार चुने हैं। यह फैसला असम की समावेशी विकास प्रतिबद्धता को मजबूत करता है और समुदाय की गरिमा बहाल करता है।