
नई दिल्ली, 5 फरवरी। बुढ़ापा जीवन का एक प्राकृतिक चरण है, कोई रोग नहीं। बचपन-यौवन की भांति वृद्धावस्था की अपनी विशेषताएं व चुनौतियां हैं, जिन्हें समझदारी से संभाला जा सकता है।
लोग उम्र के साथ थकान, कमजोरी, भूलने की आदत या चलने में कठिनाई को बीमारी समझ बैठते हैं। हकीकत में ये शारीरिक परिवर्तन हैं। सही देखभाल, स्नेह व ज्ञान से वृद्धजन स्वस्थ व आनंदमय जीवन जी सकते हैं।
इस पड़ाव पर मानसिक शांति व भावुक समर्थन सर्वोपरि। एकाकीपन, उपेक्षा व भय महसूस होते हैं। परिवारजन से संवाद, उनके तजुर्बों का आदर मन को बल देता है। प्रसन्नचित्त से तन भी मजबूत रहता, तनाव-अवसाद घटते, निद्रा-भोजन सुधरते हैं।
शारीरिक रूप से हल्की सैर, योगाभ्यास, अनुलोम-विलोम व खिंचाव पर्याप्त। पौष्टिक आहार अनिवार्य—ताजी सब्जियां, फल, दही, जल। तेलीय-मसालेदार भोजन त्यागें।
घरेलू उपचार चमत्कारिक: तलवों की मालिश से गहरी नींद, गुनगुना स्नान जोड़दर्द घटाए, नेत्र विश्राम दृष्टि सुधारे। दंत स्वच्छता, नित्य स्नान, स्वच्छ वस्त्र आत्मबल बढ़ाएं।
नियमित जांच—बीपी, मधुमेह, नेत्र-कर्ण-हड्डी—बड़ी विपत्तियां रोकें। औषधि पालन व चिकित्सक सुझाव पालन करें। सामर्थ्यानुसार कार्य दें ताकि बोझ न लगे।
समुचित संरक्षण से बुढ़ापा सुख-स्वास्थ्य का स्वर्णिम काल बन जाता है।