
भारतीय संस्कृति के अमूल्य रत्न, शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और प्रसार के लिए समर्पित 54 दुर्लभ प्रकाशनों का विमोचन एक ऐतिहासिक क्षण साबित हुआ है। ये प्रकाशन संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओडिया और मराठी जैसी आठ शास्त्रीय भाषाओं की समृद्ध साहित्यिक विरासत को उजागर करते हैं।
प्रत्येक भाषा के लिए सात-सात दुर्लभ ग्रंथों का संकलन किया गया है, जो सदियों पुरानी पांडुलिपियों और अप्रकाशित सामग्री पर आधारित हैं। इनमें प्राचीन काव्य, दर्शन ग्रंथ, वैज्ञानिक रचनाएं और धार्मिक ग्रंथ शामिल हैं। उदाहरणस्वरूप, संस्कृत में वेदांत दर्शन के अनसुने ग्रंथ और तमिल में संगम साहित्य के छिपे खजाने अब पाठकों के लिए सुलभ हो गए हैं।
यह पहल न केवल इन भाषाओं को जीवंत रखने का प्रयास है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रकाशन शोधकर्ताओं, छात्रों और साहित्य प्रेमियों के लिए अनमोल धरोहर सिद्ध होंगे। सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं के सहयोग से विकसित यह परियोजना भारतीय भाषाई विविधता को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इन प्रकाशनों की गुणवत्ता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करने हेतु शीर्ष विद्वानों की टीम ने कार्य किया है। डिजिटल संस्करण भी जल्द उपलब्ध होंगे, जिससे वैश्विक पहुंच बढ़ेगी। यह संरक्षण अभियान भाषाओं के लोप को रोकने और उनकी महत्ता को पुनः स्थापित करने की दृढ़ प्रतिबद्धता दर्शाता है।