
हिंदू धर्म में पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान की परंपरा आस्था का प्रतीक है। मकर संक्रांति की ठंडी धाराओं से लेकर कार्तिक पूर्णिमा के चंद्रमा की रोशनी तक, ये पांच प्रमुख स्नान एक आध्यात्मिक कैलेंडर बनाते हैं।
साल की शुरुआत मकर संक्रांति से होती है। प्रयागराज और हरिद्वार में लाखों भक्त गंगा स्नान कर सूर्य की उत्तरायण यात्रा का स्वागत करते हैं। तिल के लड्डू और भस्मदान के साथ यह स्नान पापों का नाश करता है।
फिर आती है महाशिवरात्रि। काशी के घाटों पर रात्रि जागरण के बाद प्रातःकालीन स्नान शिव की कृपा प्राप्ति का माध्यम है। बेलपत्र चढ़ाकर भक्त मोक्ष की कामना करते हैं।
कुंभ मेला का महत्व सर्वोच्च है। हर 12 वर्ष में चार स्थानों पर होने वाला यह मेला अमृत कणों की खोज का प्रतीक है। शाही स्नान में नगा साधु सबसे आगे होते हैं, लाखों लोग पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर पुरी का स्नान यात्रा जगन्नाथ जी का राजकीय स्नान है। 108 कलशों से अभिषेक के बाद भगवान ‘बीमार’ पड़ते हैं, जो अनूठी परंपरा है।
कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर सरोवर और गंगा घाटों पर दीपमालाओं के बीच स्नान होता है। यह वर्ष भर की तपस्या का समापन है, नई शुरुआत का संकल्प।
ये स्नान केवल शारीरिक शुद्धि नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण के स्रोत हैं, जो हिंदू संस्कृति की जड़ों को मजबूत करते हैं।