
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति स्वस्थ शरीर की चाहत रखता है, लेकिन दवाओं पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। सच्चाई यह है कि हमारा शरीर स्वयं को ठीक करने की अपार क्षमता रखता है। आयुर्वेद कहता है कि आधुनिक खान-पान और जीवनशैली ही रोगों की जननी हैं। प्रकृति की गोद में लौटना ही एकमात्र उपाय है।
सबसे पहले स्व-निदान सीखें। शरीर संकेत देता है—जोड़ों में दर्द, थकान, वजन घटना, धुंधला दिखना, बुखार या कब्ज। ये आंतरिक असंतुलन के संकेत हैं।
फिर प्रकृति से जुड़ें। समय पर ताजे फल खाएं, ये प्राकृतिक औषधि हैं। रोज 30 मिनट नंगे पैर घास पर चलें, पेड़ों से गले मिलें। इससे तनाव भागता है, मन शांत होता है।
धीरे-धीरे बदलाव दिखेगा। दर्द कम होगा, पाचन सुधरेगा। बुखार हो तो गर्म पानी में पैर डुबोएं—शरीर का तापमान बढ़ाकर बैक्टीरिया से लड़ता है।
नीम के पत्ते रोज चबाएं, ये आधे से ज्यादा रोग नष्ट कर देंगे। प्रकृति ही सच्ची चिकित्सक है, इसे अपनाकर जीवन को निरोग बनाएं।

