
हर साल 11 अप्रैल को विश्व पार्किंसन दिवस पर दुनिया भर में इस न्यूरोलॉजिकल बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाई जाती है। पार्किंसन रोग धीरे-धीरे शरीर की गतिविधियों को बाधित करता है, लेकिन शुरुआती लक्षणों को समय पर पहचान लेना मरीज के जीवन को सामान्य बनाए रख सकता है।
हाथों या पैरों में आराम के समय होने वाली कंपकंपी इसकी पहली पहचान हो सकती है। इसके साथ मांसपेशियों में कठोरता, गतिविधियों में धीमापन, चलने-फिरने में असंतुलन और छोटे-छोटे कार्यों में कठिनाई प्रमुख संकेत हैं। चेहरे पर भावहीनता, आंखों का कम झपकना और आवाज में बदलाव भी नजर आते हैं।
यह बीमारी मस्तिष्क में डोपामाइन उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं के नष्ट होने से होती है, जो मांसपेशियों के नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। ज्यादातर 60 वर्ष से ऊपर के लोगों को होती है, मगर युवाओं में भी इसका खतरा बना रहता है।
लक्षण शुरू में हल्के होते हैं, जिन्हें उम्र का असर मान लिया जाता है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि देरी घातक साबित हो सकती है। दवाओं, फिजियोथेरेपी, व्यायाम और संतुलित आहार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
अगर आपको या अपनों को लगातार थरथराहट या जकड़न महसूस हो, तो न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। जल्दी निदान से इलाज आसान होता है और मरीज लंबे समय तक स्वतंत्र रह सकता है। यह दिवस हमें सतर्क रहने की सीख देता है।

