
भारतीय घरों के आंगन में गुलाबी फूलों से सजी मधुमालती की लता हर किसी का मन मोह लेती है। विज्ञान नाम से रंगून क्रीपर कहलाने वाली यह औषधीय बेला सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। सजावट के साथ-साथ यह कई बीमारियों की रामबाण दवा है।
इसके पत्ते, फूल और छाल का उपयोग सदियों से सर्दी-खांसी, बुखार, गठिया, त्वचा रोगों के लिए होता आ रहा है। आसानी से उगने वाली इस बेला की देखभाल न्यूनतम होती है। पुरानी खांसी में तुलसी के साथ इसके पत्तों का काढ़ा बनाएं, शहद मिलाकर पिएं तो जुकाम-खांसी उड़नछू हो जाए।
त्वचा पर खुजली, मुंहासे या रोग हों तो पत्तों का लेप लगाएं, तुरंत राहत मिलेगी। किडनी में सूजन या कमजोरी हो तो छाल का काढ़ा चिकित्सक सलाह से लें, अंगों की सूजन घटेगी और कार्यक्षमता बढ़ेगी।
महिलाओं के मासिक धर्म दर्द, पेल्विक सूजन, सफेद पानी, कमर दर्द, हड्डी रोगों में फूल और छाल चमत्कारी हैं। मोटापा घटाने व हार्मोन संतुलन में भी सहायक। बाजार में इसका तेल आसानी से उपलब्ध है। प्रकृति का यह उपहार अपनाकर स्वस्थ रहें।