
घर में नवजात का आगमन होने पर परिवार की पूरी दिनचर्या उलट-पुलट हो जाती है। माता-पिता के जेहन में ढेर सारे सवाल घूमते हैं, खासकर शिशु की नींद को लेकर। दिन भर सोना और रात में बार-बार जागना देखकर वे चिंतित हो उठते हैं कि कहीं नींद की कोई गड़बड़ी तो नहीं।
लेकिन विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों से साफ है कि पहले कुछ महीनों में यह बिल्कुल स्वाभाविक है। नवजात को दिन-रात का भेद समझने में वक्त लगता है, इसलिए उनका सोना-जागना अनियमित रहता है।
शोध बताते हैं कि जन्म के शुरुआती हफ्तों में बच्चे 14 से 17 घंटे सोते हैं, कुछ 18 घंटे तक। इसमें दिन के 8-9 घंटे और रात के करीब 8 घंटे शामिल हैं, मगर छोटे-छोटे अंतरालों में। पेट छोटा होने से हर 2-3 घंटे में दूध पीने जागना पड़ता है।
तीन महीने से पहले लगातार 6-8 घंटे सोना मुश्किल होता है, जो 4-6 महीनों में ढल जाता है। रोशनी, शोर और घरेलू रूटीन इस बदलाव में सहायक बनते हैं।
नींद की इतनी मात्रा क्यों? तेज विकास के लिए। मस्तिष्क और शरीर की ग्रोथ नींद पर निर्भर करती है, जो हार्मोन रिलीज और न्यूरॉन्स के कनेक्शन में मददगार है।
फिर भी सावधानी बरतें। अगर बच्चा सुस्त लगे, दूध न मांगे या अचानक ज्यादा सोने लगे, तो डॉक्टर से संपर्क करें। यह जानकारी तनाव कम कर परिवार को मजबूत बनाती है।