
वाराणसी। कालाजार जैसी घातक बीमारी के खिलाफ ऐतिहासिक लड़ाई लड़ने वाले बीएचयू के प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल को पद्मश्री सम्मान मिला है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित इस पुरस्कार ने उनके 38 वर्षों के अथक परिश्रम को सलाम किया है।
बिहार के मुजफ्फरपुर से ताल्लुक रखने वाले प्रो. अग्रवाल ने देखा था कि कैसे लाखों मरीज बिमारी की चपेट में आते थे और हजारों की जान चली जाती थी। 80 के दशक में जांच में ही 400-500 रुपये लगते थे, जो गरीबों के बस की बात नहीं। उन्होंने आरके-39 स्ट्रिप टेस्ट विकसित किया, जिसने निदान को 10 मिनट का बना दिया।
दवाओं की असफलता के दौर में उन्होंने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी की एकल खुराक तैयार की, जिसे डब्ल्यूएचओ ने मान्यता दी। मल्टी ड्रग थेरेपी, मिल्टेफोसीन और पेरेमोमाइसिन का संयोजन आज प्राथमिक केंद्रों पर उपलब्ध है। 2002 के उनके नेतृत्व वाले शोध में 300 मरीजों पर 94 प्रतिशत सफलता मिली।
‘मैं कोई खास इंसान नहीं, बस एक साधारण बिहारी हूं,’ उन्होंने कहा। यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत विजय है, बल्कि भारत के कालाजार उन्मूलन अभियान की सफलता का प्रतीक है। प्रो. अग्रवाल का योगदान लाखों जिंदगियों को नई उम्मीद देता है।