
मुंबई, 12 फरवरी। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के शिखर पुरुष उस्ताद अमीर खां की पुण्यतिथि 13 फरवरी को देश स्मरण कर रहा है। उनके जीवन का एक ऐसा प्रसंग आज भी प्रेरणा देता है जब मंचीय असफलता ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि निखारा। मात्र 15 मिनट के प्रदर्शन के बाद श्रोताओं की नाराजगी से उतार दिए गए, फिर भी उन्होंने धैर्य और समर्पण से संगीत जगत में अमिट छाप छोड़ी।
1912 में इंदौर के संगीतमय वातावरण में जन्मे अमीर खां के पूर्वजों का संबंध दरबारी संगीत से था। पिता शाहमीर खां होलकर राजघराने के सारंगी उस्ताद थे, दादा चंगे खां बहादुर शाह जफर के सान्निध्य में गवाए। नौ वर्ष की आयु में मां के स्वर्गवास ने उन्हें भावुक बना दिया, जो उनकी गायकी में झलकता रहा।
पिता से सारंगी की शिक्षा ली, किंतु गायन की ओर आकर्षण रहा। तबला की तालीम से लयबद्धता प्राप्त हुई। घरेलू मजलिसों में दिग्गजों का आना-जाना उनकी शैली को विशिष्टता प्रदान कर गया।
1934 में मुंबई आगमन के बाद प्रारंभिक मंच कठिनाइयों भरे रहे। उनकी गहन, मंद गति वाली गायकी आम दर्शकों को भ्रमित करती। एक सम्मेलन में 15 मिनट बाद आयोजकों ने रोका, ठुमरी की मांग की। अमीर खां ने संगीत के साथ समझौता ठुकरा दिया।
ख्याल-ध्रुपद संमिश्रण से इंदौर घराना गढ़ा, जो अंतर्मुखी शैली के लिए विख्यात हुआ। फिल्मों में प्रवेश कर शास्त्रीय रागों को जन-जन तक पहुंचाया—बैजू बावरा, शबाब आदि। पद्म भूषण सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। 1974 में कोलकाता हादसे में निधन। उनका योगदान शाश्वत है।