
हिंदी सिनेमा के इतिहास में साहिर लुधियानवी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 8 मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना में जन्मे अब्दुल हई उर्फ साहिर का सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। जागीरदार परिवार में पले लेकिन माता-पिता के अलगाव ने बचपन ही तबाह कर दिया। मां के साथ गरीबी की चरम सीमाओं का सामना किया।
1943 तक छोटे-मोटे कामों की भटकन जारी रही—उर्दू अखबारों में संपादन से लेकर अन्य नौकरियां। लेकिन कविता ने रास्ता दिखाया। 1945 में ‘तल्खियां’ ने उर्दू साहित्य में धमाल मचा दिया। इसकी तीखी शायरी ने उन्हें शोहरत दिलाई।
1949 में मुंबई पहुंचे। फिल्मों में संवाद लेखन से शुरुआत हुई। 1951 में ‘नौजवान’ ने पहला बड़ा ब्रेक दिया, एसडी बर्मन के संगीत में। गुरु दत्त की ‘बाजी’ ने स्थापित कर दिया। ‘मुनीमजी’, ‘प्यासा’ जैसे क्लासिक्स में उनकी जोड़ी ने जादू बिखेरा।
साहिर के गीत प्रगतिशीलता और रोमांस का अनोखा मेल थे। ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान…’, ‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को’, ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं’, ‘हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक’, ‘ये पाप है क्या…’ जैसे बोल आज भी प्रासंगिक हैं। वे समाज को आईना दिखाते थे।
जयंती पर साहिर की यादें ताजा होती हैं। उनका जीवन साबित करता है कि मेहनत और प्रतिभा से हर बाधा पार की जा सकती है। सिनेमा जगत को ऐसे रचनाकार की कमी हमेशा खलेगी।