
बॉलीवुड की उन गायिकाओं में रेखा भारद्वाज का नाम विशेष स्थान रखता है, जिनकी आवाज दिल को छू जाती है। 24 जनवरी को 62 वर्ष की होने वाली रेखा का सफर बेहद प्रेरणादायक है। ‘ओमकारा’ का ‘लक्कड़’ हो या ‘कबीरा’, ‘नमक इश्क का’ या ‘घाघरा’—हर गीत में उनकी अनूठी ऊंची सूरत वाली आवाज जादू बिखेरती है।
उनका बचपन संगीत से भरपूर था। माता-पिता ने संगीत को तुच्छ समझा, लेकिन पिता ने ठान लिया कि बच्चों को सिखाएंगे। घर में सुबह रेडियो चालू हो जाता, तीन साल की रेखा गुनगुनाने लगीं। जन्मदिन पर नहीं केक, बल्कि संगीत सभा होती।
12 साल की उम्र में शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग शुरू हुई। ठुमरी ने उनकी आवाज को निखारा। आठ साल के अभ्यास के बाद गजल उनका जुनून बनी। वे कहती हैं, ‘पिछले जन्म में दिल टूटा होगा।’ कॉलेज में गजलों से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
1984 में विशाल भारद्वाज से मुलाकात हुई, 1991 में विवाह। फिल्मों में आवाज देने का सपना रिजेक्शन से टूटा, लेकिन 2002 में विशाल का एल्बम ‘इश्का इश्का’ आया। ‘चाची 420’, ‘गॉडमदर’ जैसे फिल्मों में गाया। ‘ओमकारा’ ने स्टार बना दिया।
रेखा की जिंदगी संगीत की मिसाल है, जो हर भाव को शब्दों में उतारती है।