
मुंबई की रंगीन दुनिया ने अनगिनत सपनों को पंख दिए, लेकिन रवि टंडन जैसे कलाकार हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे। उत्तर प्रदेश के आगरा में 17 फरवरी 1935 को जन्मे रवि के पिता जिला जज थे। माता-पिता डॉक्टर बनाने के सपने देखते थे, पर रवि का मन फिल्मों में रमा। प्री-मेडिकल में असफलता के बाद 1958 में उन्होंने पढ़ाई छोड़ मुंबई पहुंच गए।
शुरुआत कठिन थी। जूनियर आर्टिस्ट के रूप में दो रुपए प्रतिदिन कमाकर गुजारा। ‘लव इन शिमला’ में सहायक बने, फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं।
मनोज कुमार ने ‘बलिदान’ (1971) में निर्देशन का मौका दिया। फिर तो धमाल मच गया। ‘अनहोनी’, ‘मजबूर’, ‘खेल खेल में’, ‘जवाब’, ‘जिंदगी’, ‘चोर हो तो ऐसा’, ‘खुद्दार’, ‘आन और शान’, ‘नजराना’ जैसी सुपरहिट फिल्में आईं।
थ्रिलर से रोमांस तक, हर жанр में सफलता। ‘अनहोनी’ ने डर जगाया, ‘खेल खेल में’ ने ऋषि-नीतू और आर.डी. का जादू बिखेरा।
आगरा ने 2015 में प्राइड ऑफ आगरा, 2020 में ब्रज रत्न से सम्मानित किया। भावुक रवि बोले, “मुंबई ने नाम दिया, आगरा ने सपना।”
11 फरवरी 2022 को 86 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन। हिंदी सिनेमा का एक युग समाप्त, लेकिन यादें अमर।