
देशभक्ति के सूरों से सजा एक कवि, जिसकी कलम ने ब्रिटिश राज को चुनौती दी और स्वतंत्र भारत के हृदय को छू लिया। कवि प्रदीप उर्फ रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के बड़नगर में हुआ। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसे अमर गीत आज भी हर भारतीय के सीने में धड़कते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण कर मुंबई पहुंचे प्रदीप ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा। 1939 में एक कवि सम्मेलन ने उन्हें बॉम्बे टॉकीज से जोड़ा, जहां से शुरू हुई उनकी छह दशक की यात्रा। 71 फिल्मों में 1700 से अधिक गीत रचे, जिनमें देशप्रेम की लहरें थीं।
ब्रिटिश सरकार उनकी कलम से खौफजदा रही। ‘बंधन’ फिल्म का ‘चल चल रे नौजवान’ प्रतिबंधित हुआ। ‘किस्मत’ के गीतों पर भूमिगत होना पड़ा। 1962 के युद्ध में शहीदों की याद में लिखा ‘ऐ मेरे वतन…’ लता मंगेशकर को सुनाते ही उन्हें भावुक कर दिया। लता ने आशा भोसले के साथ ड्यूएट का सुझाव दिया, मगर अंत में अकेले गाया।
26 जनवरी 1963, नेशनल स्टेडियम। 50 हजार दर्शकों के बीच नेहरू और राधाकृष्णन मौजूद। लता का गायन शुरू, स्टेडियम सन्नाटे में। नेहरू की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा, ‘जिसे यह गीत न छुए, वह हिंदुस्तानी नहीं।’
1997 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला, लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में पत्नी का साया उठा, लकवा मारा, संतानों ने त्याग दिया। कोलकाता के एक व्यापारी ने आश्रय दिया। 11 दिसंबर 1998 को 83 वर्ष की आयु में निधन। उनकी स्मृति में डाक टिकट और सम्मान योजना आज भी जीवित है।