
नई दिल्ली में चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के कार्यक्रम ‘सशक्त नारी, विकसित भारत’ में अभिनेत्री-निर्देशक नंदिता दास ने सिनेमा की ताकत पर गहन विचार व्यक्त किए। आईएएनएस से विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को झकझोरने वाला माध्यम है।
उन्होंने कहा, ‘मुझे वे फिल्में भाती हैं जो दर्शकों के पूर्वाग्रहों को चुनौती दें और सोचने पर मजबूर करें। यही फिल्में मैं बनाना चाहती हूं।’ राजनीतिक लेबलिंग पर वह बोलीं, ‘कलाकार जब व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है, तो समर्थन और विरोध दोनों आते हैं। लेकिन आंतरिक विश्वास ही आपको मजबूत बनाए रखता है।’
‘केरल स्टोरी 2’ विवाद और सेंसरशिप पर नंदिता ने कला की स्वतंत्रता पर जोर दिया। ‘कला को बिना बाधा के सांस लेने का हक मिलना चाहिए। तभी समाज अच्छे-बुरे में फर्क सीखता है। मैं सेंसरशिप के खिलाफ हूं।’
तालिबान द्वारा महिलाओं पर घरेलू हिंसा को वैध ठहराने पर उन्होंने कड़ा विरोध जताया। ‘किसी भी नाम पर महिलाओं का दमन अस्वीकार्य है। मैं अपने हर माध्यम से अन्याय के विरुद्ध लड़ूंगी।’
नंदिता दास के विचार सिनेमा को समाज परिवर्तन का हथियार बनाते हैं, जो असहजता से प्रगति की राह दिखाते हैं।