
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कमाल अमरोही का नाम एक जिद्दी परफेक्शनिस्ट के रूप में चमकता है। मात्र चार फिल्मों से उन्होंने जो कमाल किया, वह आज भी निर्देशकों को प्रेरित करता है। 17 जनवरी 1918 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में जन्मे सैयद अमीर हैदर कमाल नकवी का बचपन साहित्य और शायरी से रंगा था। मुंबई पहुंचकर सोहराब मोदी की मिनर्वा में उन्होंने ‘जेलर’, ‘पुकार’ और ‘शाहजहां’ की पटकथाएं लिखीं। केएल सहगल की मदद से उनका सफर आगे बढ़ा।
1949 में ‘महल’ ने उन्हें स्टार बना दिया। मधुबाला-अशोक कुमार की जोड़ी, रहस्य-रोमांस का मिश्रण और लता की ‘आएगा आने वाला’ ने इतिहास रचा।
पत्नी मीना कुमारी संग 1953 की ‘दायरा’ संवेदनशील प्रेम कथा बनी। लेकिन ‘पाकीजा’ (1972) उनकी शान है। 1958 से शुरू, 14 साल की मशक्कत—वैवाहिक कलह, बीमारी के बावजूद पूरी हुई। अमरोही ने स्क्रिप्ट, संवाद, गीत और निर्देशन सब संभाला। मीना का तवायफ किरदार चरमोत्कर्ष था। ‘चलते चलते’ और ‘इन्हीं लोगों ने’ अमर गीत बने।
‘रजिया सुल्तान’ (1983) हेमा मालिनी के साथ आखिरी पूरी फिल्म रही, ऐतिहासिक भव्यता वाली। ‘मजनू’ अधर में लटक गई।
तीन शादियां: बिलकिस, महमूदी (बच्चे शानदार, ताजदार, रुखसार), मीना कुमारी। प्यार से तलाक तक का सफर। 11 फरवरी 1993 को 75 की उम्र में गुजरे, मीना के किनारे दफनाए गए।
कमाल पिक्चर्स और स्टूडियो उनकी दृष्टि के प्रतीक। मुगलिया शान, शायराना अंदाज ने सिनेमा को समृद्ध किया। उनकी विरासत जिंदा है।