
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 13 साल से कोमा में चल रहे हरीश के माता-पिता की गुहार पर कोर्ट ने मेडिकल सपोर्ट हटाने का आदेश दिया। यह फैसला न सिर्फ कानूनी मील का पत्थर है, बल्कि हर परिवार के लिए दर्द भरी मिसाल भी।
यह केस संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गुजारिश’ की याद दिलाता है, जो इच्छामृत्यु पर बनी थी। 2010 में रिलीज हुई इस फिल्म में ऋतिक रोशन ने लकवाग्रस्त व्यक्ति का किरदार निभाया, जो मौत का अधिकार मांगता है। भंसाली की अधिकांश फिल्में सुपरहिट होती हैं, लेकिन ‘गुजारिश’ बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।
फिल्म रिलीज होते ही विवादों ने घेर लिया। स्क्रिप्ट चोरी के आरोप लगे, तो इच्छामृत्यु को बढ़ावा देने का भी इल्जाम लगा, जो当时 भारत में गैरकानूनी थी। वकील आदित्य देवन ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन कोर्ट ने खारिज कर दी।
2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भंसाली ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि फिल्म बनाते ही हंगामा मच गया, आज चुप्पी क्यों? फिल्म की प्रेरणा किसी अपने के दर्द से मिली थी।
हरीश राणा का केस इच्छामृत्यु बहस को नई जिंदगी देता है। कानून और नैतिकता के बीच का यह संतुलन समाज को सोचने पर मजबूर करता है।