
मुंबई। गजल, फिल्म गीतों और फ्यूजन संगीत के बादशाह हरिहरन ने अपनी 50 वर्षीय संगीत यात्रा पर खुलकर बात की। विशेष साक्षात्कार में उन्होंने अपनी मौलिकता, एआर रहमान से दोस्ती और बहुभाषी गायकी के राज साझा किए।
‘घर में रागों की महक थी, संगीत मेरा स्वाभाविक साथी था, न कि करियर,’ हरिहरन बताते हैं। फिल्म जगत में प्रवेश कठिन रहा क्योंकि उन्होंने अपनी अनोखी आवाज पर कायम रहे। ‘कभी किसी की नकल न की।’
एआर रहमान के साथ अनुभव पर बोले, ‘दोस्तों जैसा विजन शेयरिंग। वह गायकों को नई उड़ान देते हैं। उनके आइडियाज सोखकर अपनी आत्मा मिलानी पड़ती है। हमेशा प्रेरक।’
गजल को आज के दौर में समकालीन बनाने की जरूरत बताई। ‘तुरत-फुरत वाली पीढ़ी के लिए ‘जान मेरी’ एल्बम लाया, जिसमें गजल को बोसा नोवा से जोड़ा- ‘गजल-नोवा’।’
फ्यूजन पर, ‘कॉलोनियल कजिन्स’ ने सीमाएं तोड़ीं। लेस्ली से आज भी चर्चा होती है। कल्पना और सच्चाई से फ्यूजन जिएगा।’
10+ भाषाओं में गाया: ‘हर भाषा की अपनी शक्ति। भावों को पकड़ना जरूरी। 50 साल का सफर यादों का खजाना, स्टूडियो में बच्चे जैसी उत्सुकता बरकरार।’