
बॉलीवुड की चमक-दमक वाली दुनिया में एक ऐसा नाम है जो शास्त्रीय संगीत की मिठास से सजी हुई आवाजों का जनक माना जाता है – पंडित गुलाम मुस्तफा खान। उन्होंने न केवल गाया, बल्कि कई पीढ़ियों के गायकों को तराशा भी।
1931 में बदायूं में जन्मे खान साहब का संगीत परिवार से ही जुड़ा था। उनके पिता उस्ताद फैयाज खान के शागिर्द अब्दुल करीम खान थे। रंगीले-सहस्वान घराने की खयाल और ठुमरी की बारीकियां सीखकर वे बॉलीवुड पहुंचे। 1960 के दशक से उनका सफर शुरू हुआ, लेकिन 70 के दशक में वे गायकों के गुरु बन गए।
लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार जैसे दिग्गजों ने उनकी शरण ली। आंधी फिल्म का ‘तेरे बिना जिंदगी से’ हो या शराबी का ‘है इसी का नाम दुनिया’, उनकी ट्रेनिंग ने गीतों को अमर बना दिया। एस.पी. बालासुब्रमण्यम से लेकर सोनू निगम तक, हर किसी ने रागों की समझ उनसे पाई।
200 से ज्यादा फिल्मों में अपनी आवाज दी, जैसे चेहरा और जोशीला। पद्मश्री, पद्मभूषण जैसे सम्मान मिले। 2021 में 89 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी विरासत बॉलीवुड के हर कोने में बसी है। आज भी ऑटोट्यून के जमाने में उनके शास्त्रीय सिद्धांत गूंजते हैं।
खान साहब ने साबित किया कि शास्त्रीय संगीत ही फिल्मी गीतों की आत्मा है। उनकी कहानी प्रेरणा है कि समर्पण से परंपरा को नई ऊंचाइयां दी जा सकती हैं।