
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी दे दी है, जो 2013 से कोमा में हैं। परिवार की लंबी लड़ाई के बाद आया यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला खड़ा किया है।
भारतीय सिनेमा ने इस जटिल विषय को बार-बार उठाया है। ये फिल्में न केवल इच्छामृत्यु पर बहस छेड़ती हैं, बल्कि मरीज की गरिमा, परिवार के दुख और नैतिक दुविधाओं को भी उजागर करती हैं। हरीश राणा मामले के बाद इनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।
1979 की ‘शायद’ इस दौड़ में सबसे आगे है। मदन बावरिया के निर्देशन में बनी यह फिल्म टर्मिनल बीमारी से जूझती महिला की कहानी है, जो दर्द से तड़पते हुए जीने की मजबूरी पर सवाल उठाती है। नीता मेहता मुख्य भूमिका में हैं, तो विजयेंद्र घाटगे, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, सिमी ग्रेवाल जैसे सितारे चमकते हैं। अदालती ड्रामा ने उस दौर में ही बहस छेड़ दी थी।
2010 में संजय लीला भंसाली की ‘गुजारिश’ ने ऋतिक रोशन को लकवाग्रस्त जादूगर एथन के रूप में पेश किया। ऐश्वर्या राय और आदित्य रॉय कपूर के साथ यह फिल्म मरीज की पीड़ा और कानूनी संघर्ष को गहराई से चित्रित करती है।
रेवती निर्देशित ‘सलाम वेंकी’ सच्ची घटना से प्रेरित है। काजोल और विशाल जेठवा एएलएस से ग्रस्त युवक वेंकी की इच्छामृत्यु की लड़ाई दिखाते हैं। परिवार का भावुक सफर और जागरूकता पर जोर दिल छू लेता है।
2014 की डॉक्यूमेंट्री ‘पैसिव यूथेनेशिया-कहानी करुणा की’ अरुणा शानबाग केस पर बनी है, जिसने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दिलाई। यह लिविंग विल की जरूरत बताती है।
ये रचनाएं समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं कि दर्दभरी जिंदगी कब बोझ बन जाती है।