
भारत की संस्कृति में ऋतुओं का गहरा महत्व है, जिसमें वसंत को राजा का दर्जा प्राप्त है। यह नई शुरुआत, खुशी और बुद्धि का प्रतीक है। सर्दी की कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे गुनगुनी धूप में बदल जाती है। खेतों में गेहूं की बालियां लहराने लगती हैं, चना-सरसों के फूल पीले-हरे रंग से जगमगा उठते हैं। इसी मनोहारी परिवेश में ज्ञान की देवी मां सरस्वती प्रकट होती हैं।
संगीतकारों और फिल्मकारों ने वसंत को विभिन्न रूपों में उतारा है—वंदना, प्रेमोत्सव या परिवर्तन के प्रतीक के रूप में। शास्त्रीय संगीत में ‘आलाप’ फिल्म का ‘माता सरस्वती शारदेय’ गीत इस भाव को शांतिपूर्वक व्यक्त करता है। यह सीखने और रचनात्मकता की प्रेरणा देता है।
‘उपकार’ का ‘आई झूम के वसंत’ गुलशन बावरा के शब्दों और कल्याणजी-आनंदजी के संगीत से वसंत को उत्सव बना देता है। ‘राजा और रंक’ का ‘संग बसंत अंग बसंती’ प्रेम का मौसम दिखाता है, आनंद बख्शी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी से सजा।
‘सिंदूर’ का ‘पतझड़ सावन बसंत बहार’ जीवन के चक्र को दर्शाता है, शमशाद बेगम की आवाज में अमर। ‘रुत आ गई रे’ जावेद अख्तर और आर.डी. बर्मन का योगदान है, जो वसंत को महसूस करने का आह्वान करता है।
‘रंग दे बसंती’ का शीर्षक गीत वसंत को जागृति का प्रतीक बनाता है, प्रसून जोशी के बोल और ए.आर. रहमान के संगीत से युवाओं में जोश भरता है। वसंत संगीत में हमेशा जीवंत रहेगा।