
13 फरवरी को सरोजिनी नायडू की जयंती पर राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। भारत कोकिला के नाम से प्रसिद्ध यह कवयित्री-स्वतंत्रता सेनानी हिंदी साहित्य से प्रेरित फिल्मों में नारी शक्ति की प्रतीक बनीं। ये फिल्में उपन्यासों और कहानियों से ली गईं हैं, जो महिलाओं के संघर्ष, प्रेम और सम्मान की गाथा बुनती हैं।
परिणीता (2005) शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर बनी, जिसमें विद्या बालन ने ललिता के रूप में समाज की कुरीतियों से जूझती प्रेमिका का चित्रण किया। दहेज और जाति भेदभाव के बीच उसकी लड़ाई दिल छू लेती है।
अमृता प्रीतम के पिंजर (2003) ने विभाजन की त्रासदी को उर्मिला मातोंडकर के पुरो के माध्यम से दिखाया। अपहरण की शिकार यह नारी अपनी पहचान बचाने की अमानवीय जद्दोजहद करती है।
लज्जा (2001) तसलीमा नसरीन के उपन्यास से प्रेरित होकर महिलाओं के शोषण पर प्रहार करती है। राजकुमार संतोषी की यह फिल्म घरेलू हिंसा और सामाजिक अन्याय को उजागर करती है।
मोहन राकेश की उसकी रोटी (1969) में मणि कौल ने एक स्त्री के मौन दर्द को गहराई से उतारा, रोजमर्रा की जिंदगी में छिपी ताकत दिखाई।
भगवती चरण वर्मा की चित्रलेखा (1964) में मीना कुमारी ने नर्तकी के पाप-पुण्य के द्वंद्व को जीवंत किया, नैतिकता पर सवाल उठाए।
साहब बीबी और गुलाम (1962) में मीना कुमारी की छोटी बहू जमींदारी के पतन में फंसी स्त्री की पीड़ा बयां करती है।
ये साहित्यिक रचनाएं सिनेमा में नारी के अटल साहस को अमर करती हैं, जो आज भी प्रेरित करती रहेंगी।