
2014 के बाद बॉलीवुड ने महिलाओं को केंद्र में रखकर ऐसी कहानियां बुनीं जो समाज की पुरानी सोच को चुनौती देती हैं। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों के समांतर फिल्मों ने महिलाओं को निडर, बुद्धिमान और आत्मनिर्भर दिखाया।
रानी मुखर्जी की मर्दानी (2014) ने शिवानी रॉय के रूप में एक साहसी पुलिसवाली पेश की, जो ट्रैफिकिंग के खिलाफ जंग लड़ती है। गोपी पुथरान के निर्देशन में बनी यह फिल्म ने एक्शन के पुरुषवादी ढांचे को तोड़ा। तीसरा भाग जल्द रिलीज होगा।
हिचकी (2018) में रानी ने टॉरेट सिंड्रोम से जूझती शिक्षिका नैना का किरदार निभाया। सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म ने मानसिक स्वास्थ्य पर रोशनी डाली, दिखाया कि जुनून बाधाओं को पार कर लेता है।
आलिया भट्ट की डियर जिंदगी (2016) में कायरा मानसिक उलझनों से निकलने की प्रक्रिया दिखाती है, शाहरुख के साथ। गौरी शिंदे ने आत्मविश्वास का संदेश दिया।
राजी (2018) में आलिया ने 1971 युद्धकालीन जासूस सहमत का रोल किया। मेघना गुलजार की थ्रिलर ने महिलाओं की देशभक्ति और चतुराई को उभारा।
थप्पड़ (2020) में तापसी पन्नू की अमृता ने घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। अनुभव सिन्हा ने कई महिलाओं की कहानियों से जागरूकता फैलाई।
द केरल स्टोरी (2023) में अदा शर्मा की शालिनी कट्टरवाद के जाल से लड़ती है। सुदीप्तो सेन की फिल्म ने पहचान की लड़ाई दिखाई।
ये फिल्में बॉलीवुड को बदल रही हैं, महिलाओं को प्रेरित कर रही हैं।