
हिंदी सिनेमा के इतिहास में संतोष आनंद का नाम उन गीतकारों में शुमार है जिनके शब्द दिलों को छू जाते हैं। ‘जीवन की ना टूटे लड़ी’ और ‘मैं ना भूलूंगा’ जैसे अमर गीतों ने उन्हें घर-घर प्रसिद्धि दिलाई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले वे एक स्कूल लाइब्रेरियन थे? किताबों की दुनिया से निकलकर उन्होंने बॉलीवुड के यादगार नगमे रचे।
5 मार्च 1940 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के सिकंदराबाद में जन्मे संतोष कुमार मिश्र एक साधारण परिवार से थे। बचपन से ही कविता उनका शौक रही। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लाइब्रेरी साइंस की डिग्री लेने के बाद दिल्ली के मिंटो ब्रिज वाले स्कूल में नौकरी मिली।
किताबों ने उनकी कल्पना को पंख दिए। कवि सम्मेलनों में भाग लेते हुए वे मंचीय कवि के रूप में लोकप्रिय हुए। जीवन का बड़ा मोड़ आया जब मनोज कुमार ने उनकी कविता सुनी और ‘पूर्व और पश्चिम’ के लिए गीत लिखने का अवसर दिया। यहीं से उनका सफर शुरू हुआ।
1972 की ‘शोर’ का ‘एक प्यार का नगमा है’ और 1974 की ‘रोटी कपड़ा और मकान’ का ‘मैं ना भूलूंगा’ ने पहला फिल्मफेयर दिलाया। 1981 की ‘क्रांति’ के सभी गीत उनके थे, जो सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म बनी। 1982 में ‘प्रेम रोग’ के ‘मोहब्बत है क्या चीज’ से दूसरा पुरस्कार मिला। 2016 में यश भारती सम्मान से सम्मानित।
26 फिल्मों में 100 से अधिक गीत लिखे, जो प्रेम, दर्द और जीवन की सच्चाई बयां करते हैं। संतोष आनंद की कहानी मेहनत और लगन की मिसाल है।