
हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग में कुछ ही निर्देशकों ने सामान्य प्रेम कहानियों को इतनी सहजता से परदे पर उतारा। इस महान निर्देशक की जयंती पर हम उनके योगदान को याद करते हैं। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने ऐसी फिल्में बनाईं जो आम आदमी के दिलों को छू गईं। उनके संवाद जीवन के आईने थे, जहां प्रेम की सादगी चमकती थी।
उनकी रोमांटिक फिल्में परिवारों की जद्दोजहद, सामाजिक बंधनों और व्यक्तिगत सपनों पर केंद्रित रहीं। हीरो-हीरोइन सामान्य थे—गली-मोहल्ले के लड़के-लड़कियां, जिनकी मोहब्बत में न कोई अतिरंग था न दिखावा। ये कहानियां थिएटरों में महीनों चलीं और घर-घर गूंजीं।
फिर आया ‘जासूस’, जो उनकी सबसे बड़ी सफलता बना। जासूसी थ्रिलर को उन्होंने घरेलू स्वाद दिया—एक आम आदमी गुप्त मिशन पर, हास्य और सस्पेंस का मिश्रण। देशभक्ति की लहर में ये फिल्म हर घर पहुंची, रेडियो पर गूंजी और टीवी पर बार-बार दिखाई गई।
आज उनकी जयंती पर सिनेप्रेमी उन्हें नमन करते हैं। उनकी सादगी भरी शैली ने निर्देशन को नई दिशा दी। डिजिटल युग में भी उनकी फिल्में प्रासंगिक हैं, जो सिखाती हैं कि सच्ची कहानी हमेशा जीतती है।