
भारतीय थिएटर और सिनेमा के जगत में दिलीप प्रभावलकर का नाम एक अनोखी मिसाल है। युवावस्था में ही उन्होंने बुजुर्ग किरदार निभाकर सबको हैरान कर दिया और मुंबई के छोटे-छोटे मंचों से लेकर हॉलीवुड के ऑस्कर तक का लंबा सफर तय किया।
महाराष्ट्र के थिएटर सर्किट में प्रभावलकर का सफर शुरू हुआ। बीस साल की उम्र में ही वे बूढ़े पिता, दादाजी के रोल कर रहे थे। ‘संध्याछाया’ जैसी नाटकों में उनकी गहरी आवाज और चेहरे के हाव-भाव ने दर्शकों को बांध लिया। थिएटर में वे सुपरस्टार बन गए।
फिल्मों में प्रवेश के बाद भी बुजुर्ग भूमिकाओं ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। ‘जपटलेला’ सीरीज में चाचा की भूमिका हो या फैमिली ड्रामा में दादाजी, हर किरदार में हास्य और भावुकता का संगम दिखा। लेकिन वे स्टिरियोटाइप से दूर रहे।
ऑस्कर का सफर ‘विलेज रॉकस्टार्स’ से जुड़ा। इस डॉक्यूमेंट्री में उनकी नैरेशन ने असम की कहानी को जीवंत किया, जो बेस्ट शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री का ऑस्कर जीत गई। यह उनके करियर का स्वर्णिम अध्याय था।
आज 74 वर्षीय प्रभावलकर युवा कलाकारों को सलाह देते हैं- हर भूमिका को सच्चाई से निभाओ। उनका जीवन प्रेरणा का स्रोत है, जो साबित करता है कि मेहनत से कोई सपना असंभव नहीं।