
10 फरवरी 2009 को पुणे में पंडित भीमसेन जोशी को भारत रत्न से नवाजा गया। किराना घराने के इस दिग्गज ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को विश्व पटल पर चमकाया। 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गडग में जन्मे जोशी का जीवन संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल है। पिता शिक्षक थे, लेकिन बाल्यकाल से संगीत ने उन्हें घेर लिया।
स्कूल जाते हुए ग्रामोफोन दुकानों पर रुककर रिकॉर्ड सुनना उनकी दिनचर्या थी। 11 साल की उम्र में गुरु की खोज में घर छोड़ दिया। बिना टिकट ट्रेन में सवार हुए, टीटीई के सामने राग भैरव गाकर यात्रियों के दिल जीत लिए, जिन्होंने टिकट-जुर्माना भरा। बीजापुर पहुंचे और सवाई गंधर्व के शाग्रद बने।
राग तोड़ी, पूरिया, भैरव, यमन की तपस्या की। 19 वर्ष की आयु में मंच पर धमाल मचाया, मुंबई में रेडियो कलाकार बने। ख्याल, ठुमरी, तप्पा, भजन, नाट्य संगीत में महारत। प्रिय राग- यमन, शुद्ध कल्याण, मारुबिहाग, बिहाग, बसंत बहार, मियां मल्हार, अभोगी, दरबारी। सात दशकों तक शुद्ध स्वर, गहनता और तानें बिखेरीं।
संगीत को साधना मानने वाले जोशी को पद्मश्री (1972), पद्मभूषण (1985), पद्मविभूषण (1999), संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, कर्नाटक रत्न, महाराष्ट्र भूषण मिले। 24 जनवरी 2011 को पुणे में अंतिम विदाई ली, लेकिन उनकी कला अमर है।