
नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में तेजी से एकीकरण के बीच भारत का आधार वर्ष को नियमित रूप से अपडेट करने का निर्णय डेटा आधारित नीतियों की दिशा में सरकार की गहरी प्रतिबद्धता को उजागर करता है। शुक्रवार को अर्थशास्त्रियों ने इसे विकास की नई ऊंचाइयों के लिए आवश्यक कदम बताया।
पीएचडीसीसीआई के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा कि नया जीडीपी फ्रेमवर्क राष्ट्रीय खातों की विश्वसनीयता को नई बुलंदी पर ले जाएगा। इससे नीति निर्माताओं, कारोबारियों और निवेशकों को विभिन्न क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति की स्पष्ट और सटीक जानकारी मिलेगी।
नई श्रृंखला में जीएसटी आंकड़े, सूचीबद्ध कंपनियों के वित्तीय नतीजे, परिवहन सूचकांक और डिजिटल प्रशासनिक स्रोतों का समावेश किया गया है। जुनेजा के अनुसार, इस व्यापक कवरेज से उत्पादन, उपभोग, निवेश और क्षेत्रीय योगदानों का आकलन अधिक मजबूत होगा, जिससे भारत विकास के अगले दौर के लिए तैयार हो सकेगा।
पीएचडीसीसीआई के सीईओ डॉ. रंजीत मेहता ने जोर दिया कि विदेशी निवेशक इन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय आंकड़ों को भारत की निजी क्षेत्र निवेश संचालित विकास गति के लिए सकारात्मक संकेत मानेंगे।
आईसीआरए की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग जीवीए की दोहरी अंकों की लगातार पांचवीं तिमाही की वृद्धि और सर्विसेज जीवीए के 9.5 प्रतिशत तक पहुंचने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आधार प्रभाव से सीपीआई मुद्रास्फीति बढ़ने की संभावना के बीच नीतिगत दरों में लंबे समय तक स्थिरता बरती जा सकती है।
यह सुधार भारत को वैश्विक पटल पर मजबूत स्थिति प्रदान करेगा, जहां विश्वसनीय आंकड़े निवेश और नीतिगत फैसलों की कुंजी साबित होंगे।