
फिल्म जगत में लंबे अर्से से यह सवाल उठता रहा है कि क्या कम बजट की फिल्में बड़े सितारों वाली ब्लॉकबस्टर के आगे थिएटरों में सांस ले पाती हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक प्रकाश झा ने हाल ही में इस बहस को नया मोड़ दिया। उनका कहना है कि सिनेमाघरों में हर तरह की फिल्मों के लिए जगह है, मगर असली परीक्षा दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव की है।
झा ने बताया कि जमशेदपुर जैसे शहरों के मल्टीप्लेक्स में एक साथ 12 फिल्में चलती हैं। दर्शकों की पसंद के आधार पर शो तय होते हैं—कुछ को एक, तो कुछ को चार शो मिलते हैं। यह व्यवस्था साबित करती है कि मांग पर सब निर्भर करता है।
हालांकि, आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बरकरार हैं। थिएटर रिलीज के साथ किराया, प्रचार, तकनीकी खर्च और वितरण लागत जुड़ जाती है, जो छोटे प्रोजेक्ट्स के लिए भारी पड़ती है। नतीजा? कई निर्माता ओटीटी की राह पकड़ लेते हैं।
प्रकाश झा का मानना है कि आज पहले से कहीं ज्यादा मौके हैं। फिल्म बनाते वक्त निर्देशक को सोचना चाहिए कि यह किसके लिए है और कैसे दिलों को छुएगी। बिना इस कनेक्शन के कोई कहानी कामयाब नहीं हो सकती।
अंततः, सिनेमा का मूल मंत्र है दर्शकों से रिश्ता जोड़ना। छोटी फिल्में अगर यह कर लें, तो थिएटरों में उनकी चमक बरकरार रहेगी।