
नई दिल्ली में आयोजित पोस्ट-बजट वेबिनार श्रृंखला के एक महत्वपूर्ण सत्र ने भारत के मानसिक स्वास्थ्य ढांचे को सशक्त बनाने पर गहन चर्चा की। ‘सबका साथ, सबका विकास– जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति’ थीम पर केंद्रित इस सत्र में केंद्रीय बजट के पैरा 87 की घोषणा पर फोकस रहा, जिसमें एनआईएमएएनएचएस-2 की स्थापना और प्रमुख संस्थानों के उन्नयन की योजना है।
देश के शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य जानकारों, शोधकर्ताओं और राज्य प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्होंने न्यूरो-मनोचिकित्सा सेवाओं के विस्तार और मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया।
चर्चा में सामने आया कि भारत में मानसिक व न्यूरोलॉजिकल रोगों का बोझ बढ़ रहा है। हर सात में से एक व्यक्ति मानसिक समस्या से जूझ रहा है, जबकि कई राज्यों में इलाज की कमी 70-90 प्रतिशत तक है। गैर-संचारी रोगों से 60 प्रतिशत से अधिक मौतें हो रही हैं, जिसमें मानसिक बीमारियां प्रमुख हैं।
उत्तर भारत में उन्नत न्यूरोइमेजिंग, क्रिटिकल केयर और विशेष उपचारों की कमी पर चिंता जताई गई। विशेषज्ञों ने कहा कि नए संस्थान और मौजूदा सुधार इलाज, प्रशिक्षण, शोध व नवाचार को गति देंगे।
समग्र रणनीति पर बल दिया गया, जिसमें बेहतर क्रिटिकल केयर, प्रशिक्षित स्टाफ, शोध प्रोत्साहन, समुदाय पहुंच और ढांचा विस्तार शामिल है। पूर्वोत्तर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और विशेषज्ञों की जरूरत बताई गई।
हब-एंड-स्पोक मॉडल के जरिए डिजिटल प्लेटफॉर्म से जिला अस्पतालों को सहायता मिलेगी, जिससे ग्रामीणों को विशेषज्ञ सेवाएं आसानी से उपलब्ध होंगी।
एनआईएमएएनएचएस से टेली-मानस सेवाओं को जोड़कर राष्ट्रीय नेटवर्क बनेगा। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन से फॉलो-अप और समन्वय मजबूत होगा।
राष्ट्रीय ब्रेन-माइंड क्लाउड नेटवर्क का प्रस्ताव आया, जो एम्स और प्राथमिक केंद्रों को जोड़ेगा। एआई टूल्स से डेटा-आधारित इलाज संभव होगा।
संस्थागत सशक्तिकरण, विशेषज्ञ वृद्धि, शोध सहयोग, रेफरल सिस्टम, क्षेत्रीय संस्थानों का उन्नयन और राष्ट्रीय रजिस्ट्रियां बनाने पर चर्चा हुई।
दीर्घकालिक रोडमैप में भारत के प्रमुख संस्थानों को दक्षिण एशिया के लिए केंद्र बनाने का लक्ष्य है, जो डब्ल्यूएचओ लक्ष्यों से मेल खाता है। यह सत्र मानसिक स्वास्थ्य सुधारों की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।