
नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय संघ तथा जर्मनी के रिश्ते अब पारंपरिक व्यापार से कहीं आगे बढ़ चुके हैं। ये अब अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता जैसे व्यापक क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं।
हाल के वर्षों में जर्मनी, फ्रांस, इटली, फिनलैंड और ईयू के नेताओं के साथ शिखर बैठकें तथा नए समझौते यूरोप को भारत के लिए हिंद-प्रशांत के बाद सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मंच बना रहे हैं। पहले ये संबंध व्यापार, सहायता और प्रवासी भारतीयों तक सीमित थे, लेकिन अब ये तकनीकी सप्लाई चेन, रक्षा निर्माण, स्वच्छ ऊर्जा तथा हिंद-प्रशांत सहयोग तक विस्तृत हो गए हैं।
पिछले पांच वर्षों में ब्रसेल्स ने भारत को वैश्विक स्थिरता का स्तंभ और ग्लोबल साउथ की प्रबल आवाज के रूप में स्वीकार किया है। फरवरी 2025 में यूरोपीय आयुक्तों का ऐतिहासिक भारत दौरा इसका जीवंत प्रमाण है।
फ्रांस ने संबंधों को विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया है। जर्मनी 25 वर्षों की साझेदारी मना रहा है। इटली ने 2025-2029 की संयुक्त योजना जारी की, जबकि फिनलैंड ने 2026 में उच्चस्तरीय वार्ताओं से बंधन मजबूत किए।
यह ढांचा ईयू स्तर पर व्यापार-डिजिटल-कनेक्टिविटी तथा सदस्य देशों पर रक्षा-उद्योग-प्रौद्योगिकी सहयोग को जोड़ता है, जो भारत की आर्थिक प्रगति और सुरक्षा को गति देता है।
जर्मनी-भारत संबंध आर्थिक से रणनीतिक उद्योग और हरित ऊर्जा की ओर अग्रसर हैं। चांसलर फ्रेडरिक मर्ज का जनवरी 2026 का दौरा भारत को हिंद-प्रशांत में प्रमुख भागीदार के रूप में चिह्नित करता है।
जर्मन पूंजी और तकनीक चीन-निर्भर चेन के जोखिम घटाएगी, मैन्युफैक्चरिंग और हरित ऊर्जा को प्रोत्साहित करेगी। जर्मनी को भारत बड़ा बाजार, चीन-निर्भरता में कमी और हिंद-प्रशांत रणनीति का साथी मिलेगा।