
भारतीय मनोरंजन जगत में कई ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपनी पारिवारिक विरासत को छोड़कर नई राह चुनी। इंदौर के शाही घराने से ताल्लुक रखने वाले शाहबाज खान का जीवन इसका जीता-जागता उदाहरण है। 10 मार्च को जन्मे शाहबाज के पिता उस्ताद अमीर खान हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायक थे, जिन्होंने ‘गावत मन मोरा झूम के’, ‘जिनके मन में राम विराजे’ जैसे अमर गीत दिए। दादा शामीर खान सारंगी के उस्ताद थे। लेकिन मां के फैसले ने संगीत की राह बंद कर दी।
मां को डर था कि महफिल में लोग कहेंगे, ‘उस्ताद अमीर खान का बेटा कैसा गाता है?’ पिता के जल्दी निधन के बाद कोई गुरु नहीं बचा। दूसरे घराने में सीखना तो विवादास्पद होता। ‘रिक्शा चला लो, संगीत मत सीखना,’ मां ने कहा। बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया।
होटल मैनेजमेंट के बाद मुंबई पहुंचे, जहां थिएटर से करियर शुरू हुआ। ‘टीपू सुल्तान’ में हैदर अली का रोल मिला, जो 58 एपिसोड तक चला। उर्दू ज्ञान से ‘चंद्रकांता’, ‘बेताल पचीसी’, ‘द ग्रेट मराठा’ जैसे सीरियल्स में धमाल मचाया। फिल्मों में ‘नाचने वाले गाने वाले’, ‘कैसे कैसे रिश्ते’, ‘धरती पुत्र’, ‘जिद्दी’, ‘युग’, ‘मेजर साब’ जैसी फिल्मों के विलेन बने।
आज टीवी और ओटीटी पर नकारात्मक भूमिकाओं से राज कर रहे हैं। शाहबाज का सफर मेहनत और भाग्य की मिसाल है, जो दिखाता है कि विरासत से अलग होकर भी शिखर छुआ जा सकता है।