
नेपाल के 5 मार्च को हुए आम चुनावों में बालेंद्र शाह उर्फ बालेन शाह ने प्रधानमंत्री पद की दौड़ में जबरदस्त जीत हासिल की है। उनकी राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर पारंपरिक राजनीति को चुनौती दी है।
शाह की इस जीत ने उनकी नागरिकता को लेकर पुरानी विवादास्पद चर्चाओं को फिर से गरमा दिया है। 2006 तक उनके नागरिकता प्रमाणपत्र में सरनेम ‘साह’ था, जिसे बाद में ‘शाह’ कर दिया गया। गृह मंत्रालय ने इसे नागरिकता अधिनियम 2063 की धारा 12 और 17(2) का उल्लंघन बताते हुए आपराधिक कृत्य करार दिया।
रैपर से मेयर और अब राष्ट्रीय नेता बने शाह की बहुमुखी छवि लोगों को आकर्षित कर रही है। काठमांडू में डेटा-आधारित शासन, अवैध अतिक्रमणों पर सख्ती ने समर्थकों को प्रभावित किया, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने इसे अहंकारी रवैया बताया। सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से जुड़ाव उनकी ताकत रहा।
हालांकि, भारत-चीन जैसे पड़ोसियों के साथ संबंध संभालने की चुनौती सबसे बड़ी है। पारंपरिक कूटनीतिक अनुभव के अभाव में उनके पुराने सोशल मीडिया पोस्ट्स बहस का केंद्र बने हैं। क्या बालेन शाह नई राजनीति की लहर को अंतरराष्ट्रीय पटल पर ले जा पाएंगे? यह सवाल नेपाल की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।