
मुंबई के सिनेमा जगत में महिलाओं की कलम ने कमाल कर दिखाया है। ये लेखिकाएं न सिर्फ स्क्रिप्ट लिख रही हैं, बल्कि निर्देशन और प्रोडक्शन में भी अपनी अमिट छाप छोड़ रही हैं। अलंकृता श्रीवास्तव, जूही चतुर्वेदी, मेघना गुलजार और गौरी शिंदे जैसी प्रतिभाएं बॉलीवुड को नई दिशा दे रही हैं।
अलंकृता श्रीवास्तव बहुआयामी हैं। ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ ने महिलाओं की छिपी इच्छाओं को बयां किया, जिसे टोक्यो से मुम्बई तक पुरस्कार मिले। ‘मेड इन हेवन’, ‘डॉली किट्टी’, ‘बॉम्बे बेगम्स’ जैसी सीरीज में उनकी लेखनी चमकी। ये रचनाएं सशक्तिकरण पर केंद्रित हैं।
जूही चतुर्वेदी की ‘पीकू’ ने दिल जीता, नेशनल और फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाए। ‘विक्की डोनर’ से शुरुआत, ‘अक्टूबर’, ‘गुलाबो सिताबो’ तक उनका सफर प्रेरणादायक। विज्ञापनों से आकर उन्होंने रोजमर्रा की कहानियां सजीव कीं।
मेघना गुलजार पिता गुलजार की विरासत संभाल रही हैं। ‘राजी’ का बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड, ‘छपाक’ का संदेश, ‘सैम बहादुर’ की तारीफ—सभी उनकी संवेदनशील लेखनी का कमाल। ‘तलवार’ ने उन्हें निखारा।
गौरी शिंदे की ‘इंग्लिश विंग्लिश’ ने श्रीदेवी को नया जीवन दिया। ‘डियर जिंदगी’ ने मानसिक स्वास्थ्य पर रोशनी डाली। उनकी फिल्में भावुक और प्रेरक हैं।
ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि कलम से क्रांति लाई जा सकती है। बॉलीवुड अब अधिक समावेशी हो रहा है।