
हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ-साथ हिंदी सिनेमा के महान शायर साहिर लुधियानवी की जयंती भी मनाई जाती है। 1921 में लुधियाना जन्मे साहिर ने अपनी कलम से प्रेम, दर्द, विद्रोह और इंसानी जज्बातों को इतनी खूबसूरती से उकेरा कि आज भी उनके गीत दिलों को छू जाते हैं। लेकिन उनकी सबसे मार्मिक कहानी तब बनी जब उनके शब्दों ने मोहम्मद रफी जैसे दिग्गज गायक को रुला दिया।
संगीतकार रवि ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया कि 1968 की फिल्म ‘नील कमल’ के गाने ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ की रिहर्सल में साहिर के भावुक बोल सुनकर रफी साहब की आंखें भर आईं। घबरा गए रवि ने बाहर बुलाकर पूछा तो रफी ने बताया, उनकी बेटी की सगाई हाल ही हुई थी। गाने की विदाई की भावना उनकी अपनी जिंदगी से जुड़ गई, जिससे भावुक हो गए।
रिकॉर्डिंग में भी रफी की आवाज में सिसकियां साफ सुनाई देती हैं। इतना गहरा असर था कि रफी ने शादी का फंक्शन छोड़कर गाना रिकॉर्ड किया और पैसे भी नहीं लिए। यह गीत नेशनल अवॉर्ड जीत चुका है और आज हर विवाह में बहू की विदाई पर बजता है।
साहिर की प्रतिभा असीम थी। वे भजन से लेकर कव्वाली, रोमांस से व्यंग्य तक सब लिखते। उसी फिल्म का ‘खाली डब्बा खाली बोतल’ मन्ना डे की आवाज में महमूद पर फिल्माया गया। बोल थे- ‘खाली से मत नफरत करना, खाली सब संसार।’ जीवन की खोखलापन पर तीखा कटाक्ष।
‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा…’ जैसे पंक्तियां एकता का संदेश देती हैं। रवि के मुताबिक साहिर मूडी थे, लेकिन गीत लेकर लौटते परफेक्ट। क्रेडिट शेयर करने में उदार। साहिर की यह कहानी बताती है कि सच्चे शब्द दिल को कैसे हिला सकते हैं।