
भारतीय सिनेमा की दुनिया में कमलिनी मुखर्जी का नाम सादगी और गहराई का प्रतीक है। 4 मार्च 1984 को कोलकाता में जन्मीं कमलिनी का शुरुआती जीवन शब्दों की दुनिया से जुड़ा था। कविताएं लिखना और साहित्य पढ़ना उनका पहला जुनून था। घर का रचनात्मक वातावरण, जहां पिता व्यापारी और मां ज्वैलरी डिजाइनर थीं, ने उनकी प्रतिभा को निखारा।
कोलकाता यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएशन करने के दौरान वे नाटकों में भी सक्रिय रहीं। दिल्ली में होटल मैनेजमेंट का कोर्स छोड़ मुंबई पहुंचीं, जहां थिएटर वर्कशॉप ने उनके अभिनय को पंख दिए। 2004 में हिंदी फिल्म ‘फिर मिलेंगे’ से डेब्यू किया, जो एड्स जागरूकता पर बनी थी।
उसी साल तेलुगू फिल्म ‘आनंद’ ने उन्हें स्टार बना दिया। आत्मनिर्भर लड़की का किरदार निभाकर नंदी अवॉर्ड जीता। ‘गोदावरी’, ‘गम्यम’ जैसी तेलुगू हिट्स के बाद तमिल की ‘वेट्टैयाडू विलाययाडू’ और मलयालम की ‘पुलिमुरुगन’ में चमकीं। तेलुगू, तमिल, मलयालम, कन्नड़, हिंदी—हर भाषा में उनकी बहुमुखी प्रतिभा झलकी।
भरतनाट्यम की ट्रेनिंग ने उनके अभिनय को और प्रभावी बनाया। साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले किरदार चुनकर उन्होंने साबित किया कि सच्ची कला समय की कसौटी पर खरी उतरती है। कमलिनी का सफर हर उभरते कलाकार के लिए प्रेरणा है।