
बिहार के मुंगेर में सरकारी नौकरी की लालच में दो दोस्तों ने जो चाल चली, वो आधुनिक तकनीक के आगे धरी रह गई। मुकेश कुमार ने रेलवे टेक्नीशियन की भर्ती के लिए पड़ोसी रंजीत कुमार से साठगांठ की। 6 लाख रुपये देकर रंजीत ने मुकेश बनकर परीक्षा दी और मेडिकल भी पास कर लिया।
सबसे चतुराई भरा कदम था हाइब्रिड फोटो का। गूगल से तस्वीरें लेकर एडिटिंग से दोनों चेहरे मिलाए गए, ताकि जांच में उम्र का हवाला देकर बच निकलें। इसी के दम पर जुलाई 2025 में मुकेश को चयन मिला। वो दमोह, सागर, जबलपुर में ड्यूटी करता रहा और प्रयागराज ट्रेनिंग तक पहुंच गया।
लेकिन रेलवे का बायोमेट्रिक नियम बिगाड़ गया। 14 नवंबर 2025 को अंगूठे और चेहरे का स्कैन होने पर डेटा मैच नहीं हुआ। मुकेश भागा, मगर जबलपुर सीबीआई ने मुंगेर में दबिश देकर उसे और रंजीत को गिरफ्तार कर लिया।
अब जांच में रंजीत के कोचिंग से जुड़े अन्य फ्रॉड की पड़ताल हो रही है। आधार-बायोमेट्रिक्स ने साबित किया कि फोटो जालसाजी अब बेकार है। अपडेट आसान, लेकिन वेरिफिकेशन में लाइव स्कैन जरूरी—ये ही असली सुरक्षा है।