
भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान एक चमकते सितारे की तरह थे। उनका जन्म 3 मार्च 1931 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक संगीतमय परिवार में हुआ। पिता उस्ताद वारिस हुसैन खान के सान्निध्य में बचपन से ही राग-रंग की दुनिया में रम गए। महज आठ वर्ष की आयु में जन्माष्टमी के दिन बदायूं के विक्टोरिया गार्डन में उनकी पहली प्रस्तुति ने संगीत जगत को हैरान कर दिया।
परिवार का घर रियाज़ की धुनों से गूंजता था। यही माहौल ने उन्हें प्रारंभिक शिक्षा दी। नगरपालिका अध्यक्ष के आग्रह पर मंच पर उतरे आठ साल के मुस्तफा ने ऐसा राग छेड़ा कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। सबने कहा- ये बच्चा भविष्य का बड़ा कलाकार बनेगा।
फिल्मों में भी उनकी आवाज़ गूंजी- भुवन शोम, उमराव जान, आगमन जैसी। लेकिन शास्त्रीय संगीत ही उनका असली धर्म था। लता मंगेशकर, आशा भोसले, ए.आर. रहमान जैसे दिग्गजों को उन्होंने दीक्षित किया।
देश ने उनके योगदान को पद्मश्री (1991), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2003), पद्म भूषण (2006) और पद्म विभूषण (2018) देकर सम्मानित किया। ब्रेन स्ट्रोक से जूझते हुए 17 जनवरी 2021 को मुंबई में 89 वर्ष की आयु में वे चल बसे। उनकी धुनें आज भी जीवंत हैं।