
भारत का सक्रिय फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट (एपीआई) बाजार वर्तमान में 15-16 अरब डॉलर का है और वित्त वर्ष 27-28 में 5-7 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज करने की संभावना है। केयरएज रेटिंग्स की ताजा रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गई है।
यह वृद्धि सरकारी नीतियों के अनुकूल माहौल, जटिल और उच्च क्षमता वाले एपीआई की ओर बदलाव, घरेलू मांग में उछाल तथा नियंत्रित व उभरते बाजारों में गहरी घुसपैठ से संभव होगी। भारतीय फार्मा कंपनियां मूल्यह्रास रोकने, मुनाफे को बढ़ाने और ग्राहकों को बरकरार रखने हेतु बुनियादी से जटिल एपीआई की ओर मुड़ रही हैं।
चीन पर प्राथमिक सामग्री के आयात की निर्भरता चिंता का विषय बनी हुई है, मगर उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) और बल्क ड्रग पार्कों से प्रगति दिख रही है। 30 से अधिक परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं तथा कई कंपनियों ने नई क्षमताएं चालू की हैं।
उच्च क्षमता वाले एपीआई की मजबूत पाइपलाइन विकसित हो रही है, जो मूल्य श्रृंखला में भारत की स्थिति मजबूत करेगी। व्यावसायीकरण में 2-4 वर्ष लग सकते हैं।
केयरएज के सहायक निदेशक प्रितेश राठी के अनुसार, दीर्घकालिक वृद्धि बुजुर्ग आबादी, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, बीमा कवरेज, पुरानी बीमारियां, एकाधिकार का अंत तथा उभरते बाजारों में विस्तार से आएगी।
बल्क ड्रग पार्क 80 प्रतिशत परियोजनाओं के केंद्र में हैं। आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश व गुजरात में 20-40 अरब रुपये की सुविधाएं घरेलू उत्पादन को बल देंगी, आयात कम करेंगी तथा लागत दक्षता बढ़ाएंगी। भारत का एपीआई क्षेत्र आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।