
भारत की स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी शख्सियत थीं सरोजिनी नायडू, जिन्हें ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ और ‘भारत कोकिला’ कहा गया। महात्मा गांधी द्वारा दिए गए इस खिताब ने उनकी काव्यात्मक प्रतिभा को सम्मानित किया। मात्र 12 वर्ष की आयु में कविताएं लिखने वाली नायडू ने शब्दों के जादू से राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रज्ज्वलित की।
उनकी रचनाएं ब्रिटिश रोमांटिक काव्य से प्रेरित थीं, लेकिन भारतीय मिट्टी की सुगंध से ओतप्रोत। हैदराबाद के बाजारों की चहल-पहल, प्रकृति की रंगीनियां और आमजन की भावनाएं उनकी पंक्तियों में जीवंत हो उठतीं। ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ उनकी पहली कृति थी, जो घर के नाम पर रखी गई और भारतीय जीवन की सादगी दर्शाती है।
‘इन द बाजार्स ऑफ हैदराबाद’ जैसी रचनाएं स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बनीं। ‘द बर्ड ऑफ टाइम’, ‘द ब्रोकन विंग’ और ‘द सेप्टर्ड फ्लूट’ में प्रेम, मृत्यु, भाग्य और राष्ट्रवाद का संगम दिखता है। कविताएं जैसे ‘कॉरोमंडल फिशर्स’ और ‘इंडियन वीवर्स’ क्रांति की पुकार बनीं।
राजनीति में भी अग्रणी, 1925 में कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। दांडी यात्रा में गांधीजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलीं। स्वतंत्र भारत में उत्तर प्रदेश की पहली गवर्नर रहीं। महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और समानता के लिए जीवन समर्पित किया।
उनका मानना था कि राष्ट्रसेवा में लिंगभेद नहीं चलता। 2 मार्च को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करता भारत उनकी रचनाओं से प्रेरणा लेता रहेगा।