
उज्जैन की पावन धरती पर शिप्रा नदी के त्रिवेणी घाट पर बसा 2000 वर्ष पुराना नवग्रह शनि मंदिर एक अनोखा रहस्य समेटे हुए है। यहां शनि देव पिंडी रूप में विराजमान हैं, जिनका रंग काला नहीं बल्कि भगवा है। यह भारत का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां शनि बाबा शिव के अवतार के रूप में पूजे जाते हैं।
भक्तों की मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से साढ़े साती, ढैय्या जैसी हर समस्या का समाधान हो जाता है। शनिवार को अमावस्या पड़ने पर घाट भक्तों से अट जाता है। कष्टों से घिरे लोग चप्पल-कपड़े यहीं छोड़ आते हैं, जिससे शारीरिक-मानसिक पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है।
मंदिर के गर्भगृह में निरंतर तेल टपकता रहता है, जो शनि की विशेष कृपा का प्रतीक है। हनुमान जी जैसी भगवा प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है। राजा विक्रमादित्य द्वारा निर्मित इस छोटे से मंदिर में प्राचीन पीपल का वृक्ष है, जहां धागा बांधने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
दशा पूजन का विशेष महत्व है, जो देशभर से भक्तों को खींच लाता है। हाल ही में बाहर शेड लगाए गए हैं। यह मंदिर आस्था का ऐसा केंद्र है जहां नवग्रहों का संतुलन आसानी से हो जाता है, जीवन को नई दिशा मिलती है।