
हिंदी सिनेमा ने समय के साथ कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कहानियां बदल गईं, तकनीक नई हुई, दर्शकों की रुचि भी निखर गई। लेकिन इस सबके बीच बच्चों के लिए फिल्में बनाना लगभग ठप हो चुका है। प्रसिद्ध निर्देशक रवि उदयवार ने इस कमी पर खुलकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि उद्योग को बच्चों की मासूम दुनिया को समझने वाली कहानियों पर ध्यान देना चाहिए।
एक जमाना था जब परिवार संग देखने लायक सादा-सादी फिल्में आम थीं। आज एक्शन और बड़े बजट के जमाने में बच्चों की फिल्में गायब सी हो गई हैं। आईएएनएस से बातचीत में उदयावर बोले, ‘हमें बच्चों के लिए ऐसी फिल्में बनानी चाहिए जो उनकी भावनाओं को सच्चाई से पेश करें। आज की फिल्मों में मासूमियत गायब होती जा रही है।’
वे अपनी फिल्मों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि रोमांस में भी पुरानी सहजता लौटानी चाहिए। पहले प्रेम कहानियां दिल को छू जाती थीं, अब सब दिखावटी लगता है। जब बच्चों को अपनी फिल्में न मिलें तो वे के-ड्रामा और विदेशी कंटेंट की शरण लेते हैं, जहां सरल प्रेम कथाएं मिलती हैं।
उदयावर मानते हैं कि दर्शक जटिल ड्रामा से ज्यादा सच्चे रिश्तों को देखना पसंद करते हैं। उनकी फिल्मों में कहानी को धीमे चलाकर दर्शकों से जोड़ने की कोशिश होती है। कभी-कभी गति कम करके ही सिनेमा की असली आत्मा जागृत की जा सकती है।
यह मुद्दा बॉलीवुड के लिए बड़ा संदेश है। बच्चों की फिल्में बढ़ाकर न सिर्फ नई पीढ़ी को जोड़ा जा सकता है, बल्कि विदेशी कंटेंट से मुकाबला भी किया जा सकता है। उद्योग को अब सोचना होगा कि भविष्य कैसे संवारा जाए।