
आज की भागमभाग जिंदगी में दिनचर्या बिगड़ जाना आम हो गया है, जिससे बीमारियां घर कर लेती हैं। आयुर्वेद हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने की सीख देता है। सूर्योदय से पूर्व उठना पहला कदम है। इस समय वातावरण शुद्ध होता है, मन ताजा रहता है। उठते ही गुनगुने पानी का आधा लीटर पिएं, जो विषाक्त पदार्थ बाहर निकालता है और पाचन सुधारता है।
शौचादि से निवृत्त होकर दांत साफ करें। नीम दातुन या ब्रश से सफाई, जीभ मलना, तेल से कुल्ला करें। नाक में तेल की दो बूंदें डालें, आंखें ठंडे पानी से धोएं। इससे इंद्रियां सजग होती हैं।
अभ्यंग अर्थात तेल मालिश रोज करें। तिल या सरसों के तेल से हल्के हाथों शरीर की मालिश रक्तप्रवाह बढ़ाती है, त्वचा निखारती है, तनाव भगाती है। सिर-पैरों पर विशेष ध्यान दें।
फिर योग, प्राणायाम या हल्की सैर करें जब तक हल्का पसीना न आ जाए। नहाते समय सिर पर सामान्य पानी, धड़ पर गुनगुना। स्नान से आलस्य भागता है।
भोजन ताजा, सात्विक हो। समयबद्ध, अच्छे चबाकर खाएं। रात का हल्का भोजन जल्दी करें। नींद के लिए 6-8 घंटे लें। सोने से पूर्व पैर मलें, ध्यान करें। यह दिनचर्या अपनाएं, जीवन सवांरें।